नितनेम


हर रोज पाठ के महत्व

मंगलाचरण हर शुभ कार्य से पहले पढना चाहिये ।

ब्रह्मबेदी के पाठ से निरगुण ब्रह्म की उपासना होती है ।

मूल मंत्र के पाठ से निरगुण ब्रह्म की उपासना होती है ।

सूर्य गायत्री का पाठ करते हुये सूर्य को जल देना चाहिये।

गीता गायत्री से योग क्रियाओ की प्ररेणा मिलती है।

सातों वार की रमैणी के पाठ से ग्रहों की शांति होती है।

सर्व लक्षणा ग्रंथ के पाठ मे मानवीय गुण-अवगुण का वर्णण है. जिससे शुभ गुण अपनाने की प्ररेणा मिलती है।

असुर निकन्दन रमैणी का पाठ दोपहर 12 बजे के बाद रात 12 बजे से पहले करना चाहिये।

संध्या आरती करने से दिन भर की उपासना पूर्ण होती है।



|| अथ मंगलाचरण ||

 गरीब नमो नमो सतपुरुष कूं, नमस्कार गुरु कीन्ह ही | सुर नर मुनिजन साधवा, संतों सरबस दीन्ह हीं || १ ||
 सतगुरु साहिब संत सब, दण्डौतं प्रणाम | आगे पीछे मध्य हुए, तिन कूं जां कुरबान || २ ||
 नराकार निरविषम, काल जाल भय भंजनं | निरलेपम निज निर्गुणं, अकल अनूप बेसुन्न धुन्न || ३ ||
 सोहं सुरति समापतं, सकल समाना निरतले | उजल हिरम्बर हरदमं, बे प्रवाह अथाह है, वार पार नहीं मध्यतं ||
 गरीब जो सुमिरत सिद्धि होई, गणनायक गलताना | करो अनुग्रह सोई, पारस पद प्रवाना || १ ||
 आदि गणेश मनाऊं, गण नायक देवन देवा | चरण कमाल ल्यौ लाऊं, आदि अंत करहुं सेवा || २ ||
 परम शक्ति संगीतं, रिद्धि सिद्धि दाता सोई | अवगत गुनह अतीतम्, सत पुरुष निरमोही || ३ ||
 जगदम्बा जगदिसम् , मंगल रूप मुरारी | तन मन अरपुं शिषम् , भक्ति मुक्ति भंडारी || ४ ||
 सुर नर मुनि गण ध्यावें, ब्रह्मा विष्णु महेशा | शेष सहंस मुख गावैं, पूजें आदि गणेशा || ५ ||
 इन्द्र कुबेर सरीखा, वरुण धर्मराय ध्यावें | सुमरत जीवन जीका, मन इछ्या फल पावें || ६ ||
 तेंतीस कोट अधारा, ध्यावें सहंस अठासी | उतरें भौ जल पारा, कटी है जम की फाँसी || ७ ||

।। ब्रह्म वेदी ।।

 ज्ञान सागर अति उजागर, निर्विकार निरंजनं। ब्रहा ज्ञानी महाध्यानी, सत् सुकृत दुःख भंजनम्।।
 मूल चक्र गणेश बासा, रक्त वर्ण जहां जानिये। किलियं जाप कुली तज सब, शब्द हमारा मानिये।।
 स्वाद चक्र ब्रहादि बासा, जहां सावित्री ब्रहा रहैं। उ जाप जपंत हंसा, ज्ञान जोग सतगुरु कहैं।।
 नाभि कमल में विष्णु विशंभर, जहां ल़क्ष्मी संग बास हैं। हरियं जाप जपंत हंसा, जानत बिरला दास हैं।।
 हृदय कमल महादेव देवं, सती पार्वती संग हैं। सोहं जाप जपंत हंसा, ज्ञान जोग भल रंग हैं।।
 कण्ठ कमल में बसे अविद्या, ज्ञान ध्यान बुद्धि नासही। लील चक्र मध्य काल कर्मम, आवत दम कूं फांसही।।
 त्रिकुटी कमल परम हंस पूर्ण, सतगुरु समरथ आप हैं। मन पौना सम सिंध मेलो, सुरति निरति का जाप हैं।।
 सहंस कमल दल आप साहिब, ज्यूं फूलन मध्य गंध हैं। पूर रहाा जगदीश जोगी, सत् समरथ निर्बन्ध हैं।।
 मीनी खोज हनोज हरदम, उलट पंथ की बाट हैं। इला पिंगला सुषमन खोजो, चल हंसा औघट घाट है।।
 ऐसा जोग विजोग वरणों, जो शंकर ने चित धरया। कुम्भक रेचक द्वादस पल्टे, काल कर्म तिस तें डरया।।
 सुन्न सिंधासन अमर आसन, अलख पुरुष निर्बान हैं। अति ल्योलीन बेदीन मालिक, कादर कूं कुर्बान है।।
 है निरसिंध अबंध अविगत, कोटि बैकुण्ठ नख रुप हैं। अपरम पार दीदार दमेर्शन, ऐसा अजब अनूप हैं।।
 घुरैं निसान अखण्ड धुनि सुनि, सोहं वेदी गाईये। बाजैं नाद अगाध अग है, जहां ले मन ठहराईये।।
 सुरति निरति मन पवन पलटे , बंक नाल सम कीजिये। सरबै फूल असूल अस्थिर, अमी महारस पीजिये।।
 सप्त पुरी मेरुदण्ड खोजो, मन मनसा गह राखिये। उड है भंवर आकाश गमनं, पांच पच्चीसौं नाखिये।।
 गगन मंडल की सैल कर ले, बहुरि न ऐसा दाव हैं। चल हंसा परलोक पठाउं, भौ- सागर नहीं आव हैं।।
 कन्द्रप जीत उदीत जोगी, षट कर्मी योह खेल हैं। अनभै मालिन हार गूंदे, सुरति निरति का मेल है।।
 सोहं जाप अजाप थरपो, त्रिकुटी संयम धुनि लगै। मान सरोवर न्हान हंसा, गंग सहंस मुख जित बगै।।
 कालंद्री कुरबार कादर, अविगत मूरत खूब है। छत्र श्वेत विशाल लोचन, गलताना महबूब हैं।।
 दिल अंदर दीदार दर्शन, बाहर अन्त न जाईये। काया माया कहा बपरी, तन मन शीश चढाईये।।
 अविगत आदि जुगादि जोगी, सत् पुरुष ल्यौलीन हैं। गगन मंडल गलतान गैबी, जात अजात बे-दीन है।।
 सुख सागर रतनागर निर्भय, बिन मुख बानी गाावहीं। बिन आकार अजोख निर्मल, दृष्टि मुष्टि नहीं आवहंीं।।
 झिल-मिल नूर जहूर जोति, कोटि पदम उजियार हैं। उल्टे नैन बेसुन्न बिस्तर, जहां तहां दीदार हैं।।
 अष्ट कमल दल सकल रमता, त्रिकुटी कमल मध्य निरखहीं। स्वेत ध्वजा सुन्न गुमट आगे, पचरंग झंडे फरक ही।।
 सुन्न मंडल सत् लोक चलिए, नौ दर मुंद बिसुन्न हैं। बिन चिश्मों एक बिंब देख्या, बिन श्रवण सुनि धुनि हैं।।
 चरण कमल में हंस रहते, बहुरंगी बरियाम हैं। सूक्ष्म मूरति श्याम सूरति, अचल अभंगी राम हैं।।
 नौ सुर बंध निसंक खोलो, दसवें दर मुख मूल हैं। माली न कूप अनूप सजनी, बिन बेली का फूल हैं।।
 स्वास उसास पवन कूं पल्टे, नाग फुनी कूं भूंच है। सूरति निरति का बंाध बेडा, गगन मंडल कू कूंच हैं।।
 सुन ले जोग विजोग हंसा, शब्द महल कूं सिद्ध करो। योह गुरु ज्ञान विज्ञान वाणी, जीवत ही जग में मरो।।
 उजल हिरंबर स्वेत भौंरा, अक्षै वृक्ष सत् बाग है। जीतो काल बिसाल सोहं, तरतीबर बैराग है।।
 मनसा नारी कर पनिहारी, खाखी मन जहां मालिया। कुंभक काया बाग लगाया, फूले हैं फूल विसालिया।।
 कच्छ मच्छ कूरंभ धौलं, शेष सहंस फुन गावहीं। नारद मुनि से रटैं निसदिन, ब्रहा पार न पावहीं।।
 शंभु जोग बिजोग साध्या अचल अडिग समाधि है। अविगत की गति नहीं जानी। लीला अगम अगाध है।।
 सनकादिक और सिद्ध चैरासी, ध्यान धरत है तास का। चैबीसों अवतार जपत हैं, परम हंस प्रकाश का।।
 सहंस अठासी और तैतीसों, सूरज चंद चिराग हैं। धर अंबर धरनी धर रटते, अविगत अचल बिहाग हैं।।
 सुर नर मुनिजन सिद्ध और साधक, पार ब्रहा कूं रटत है। घर-घर मंगलाचार चैरी, ज्ञान जोग जहां बटत हैं।।
 चित्र गुप्त धर्म राये गावैं, आदि माया ओंकार हैं। कोटि सरस्वती लाप करत हैं, ऐसा ब्रहा दरबार हैं।।
 कामधेनु कल्प वृक्ष जाकैं, इन्द्र अनन्त सुर भरत हैं। पार्वती कर जोर लक्ष्मी, सावित्री शोभा करत हैं।।
 गंधर्व ज्ञानी और मुनि ध्यानी, पांचों तत खवास हैं। त्रिर्गुण तीन बहुरंग बाजी, काई जन बिरले दास हैं।।
 ध्ूव प्रहलाद अगाध अग है, जनक विदेही जोर हैं। चले विमान निदान बीत्या, धर्म राय की बंध तोर हैं।।
 गोरख दत जुगादि जोगी, नाम जलंधर लीजिए। भरथरी गोपीचंद सीझे, ऐसी दीक्षा दीजिए।।
 स्ुालतानी बाजीद फरीदा, पीपा परचे पाईया। देवल फेर्या गोप गुसांई, नामा की छान छिवाईया।।
 छान छिवाई गउ जिवाई, गनिका चढी विमान में। सदना बकरे कूं मत मारे, पहुॅचे आन निदान में।।
 अजामेल से अधम उधारे, पतित पावन बिरद तास है। केशो आन भया बनजारा, षट दल कीन्ही हांस हैं।।
 धना भक्त का खेत निपाया, माधो दई सिकलात है। पंडा पांव बुझाया सतगुरु, जगन्नाथ की बात है।।
 भक्त हेत केशो बनजारा, संग रैदास कमाल थे। हे हरे हे हर होती आई, गून छई और पाल थे।।
 गैबी ख्याल विशाल सतगुरु, अचल दिगंबर थीर हैं। भक्त हेत काया धर आए, अविगत सत् कबीर हैं।।
 ननक दादू अगम अगाधू तिरी जहाज खेवट सही। सुख सागर के हंस आये, भक्ति हिरंबर उर धरी।।
 कोटि भानू प्रकाश पूर्ण, रुम-रुम की लार हैं। अचल अभंगी है सतसंगी, अविगत का दीदार हैं।।
 धन सतगुरु उपदेश देवा, चैरासी भर्म मेटही। तेज पुंज तन देह धर कर, इस विध हम कूं भेंट की।।
 शब्द निवास आकाश वाणी, योह सतगुरु का रुप हैं। चंद सूर्य नहीं पवन पानी, ना जहां छाया धूप हैं।।
 रहता रमता राम साहिब, अविगत अलह अलेख हैं। भूले पंथ विटंबवादी, कुल का खाविंद एक हैं।।
 रुम-रुम में जाप जप लें, अष्ट कमल दल मेल हैं। सुरति निरति कं कमल पठवों, जहां दीपक बिन तेल हैं।।
 हरदम खोज हनोज हाजर, त्रिवेणी के तीर हैं। दास गरीब तबीब सतगुरु, बंदी छोड कबीर है।।


|| अथ मूल मंत्र ग्रन्थ ||


 निरंजन निरंजन निराकार भज रे | ताता न सीरा, राता न पीरा, धरो ध्यान धीरा रह्या आप थीर रे || १||
 अडोलम् अबोलम् अछेदम् अभेदम् , परे से परे रे कहो कौंन हेरे | अगम अथाह दरिया, गया तू बिसर रे ||२ ||
 बिना मूल मौला, जो काला न धौला | सुरति सिंध सैल , करो दूर फैलम, भजो क्यों न हरि रे ||३||
 पशु तूँ पतंगम् भुवंगम् बिसासी, दई देह नर रे | रटो राम रमता रखो सील समता, करै तोहि अजर रे || ४||
 अलख नूर मेला गुरु कौन चेला, बजर काल डर रे | शब्द में समाना अमाना अजोखम्, चलो क्यूं न घर रे || ५||
 मूल मन्त्र गौहराया, भेद किन्हे विरले जन पाया | पिंड ब्रह्मंड सै सिंध न्यारी, कुछ ऐसी ही धारना धारी || ६||
 दिल अंदर दीदार नहीं वार पार, बजर पौल पट खोल | नहीं तोल मोल, शब्द सिंध झलकै, दास गरीब निज नूर पलकै || 7||

।। सूर्य गायत्री।।

 उगमंत सूरं, वर्षत नूरं, बाजतं तूरं, सकल लोक भरपूरं, काल कंटक दूरं।। 1।।
 सत् सुकृत श्री सूरज बाला, जप तप संयम के रखवाला। हाथ खड्ग गल पौहप की माला, कानों कुण्डल रुप विशाला।। 2।।
 रिद्धि सिद्धि दीजो कर प्रतिपाला, मोक्ष मुक्ति के तुम ही दयाला। हम पर सूरज कर कृपाला। दास गरीब चितावन वाला।। 3।।

।। गीता गायत्री।।


 पान अपान समानादं, मन इंद्री फल अस्थिरं। नासाग्रे निरालंबं, चीन्हते द्वादस दलं।
 अगर मूले न मूूर्छा, मूर्छा सः जीव जन्मं।ज् जीव जन्मं सः भ्रम भूते, भ्रम भूते सः कर्म कालं, कर्म कालं सः विनास्ती।
 हर-हर-हर उचार, शिव योगी की गति अपार। महादेव कैलाश कुंज, सुरनर मुनिजन, सिर करैं पुंज।
 दास गरीब धर शिव का ध्यान, भक्ति मुक्ति जिन दीन्ही दान

|| अथ सातों बार की रमैणी ||


 सातों बार समूल बखानौं, पहर घड़ी पल ज्योतिष जानौं ||१||
 ऐतवार अन्तर नहीं कोई, लगी चांचरी पद में सोई ||२||
 सोम संभाल करो दिन राती, दूर करो नै दिल की काती ||३||
 मंगल मन की माला फेरो, चौदा कोटि जित जम जेरो ||४||
 बुध बिनानी विद्या दीजै, सत सुकृत निज सुमरन कीजै ||५||
 बृहस्पति भ्यास भये बैरागा, तातैं मन राते अनुरागा ||६||
 शुक्र साला कर्म बताया, जद मन मान सरोवर नहाया ||७||
 सनीचर स्वसा माहिं समोया, जब हम मक्रतार मग जोया ||८||
 राहु केतु रोकैं नहीं घाटा, सतगुरु खोलै बज्र कपाटा ||९||
 नौ ग्रह नमन करै निरबाना, अविगत नाम निरालंभ जाना ||१०||
 नौ ग्रह नाद समोये नासा, सहस कमल दल कीन्हा बासा ||११||
 दिशा सूल दहौं दिस का खोया, निरालंभ निरभै पद जोया ||१२||
 कठन विषम गति रहन हमारी, कोई ना जानत है नर नारी ||१३||
 चन्द्र समूल चिंतामणि पाया, गरीबदास पद पदहि समाया ||१४||

।। अथ सर्व लक्षणा ग्रन्थ ।।


 उत्तम कुल कर्तार दे, द्वादश भूषण संग । रूप द्रव्य दे दया करि, ज्ञान भजन सत्संग ।।१।।
 शिल संतोष विवेक दे, क्षमा दया एकतार । भाव भक्ति बैराग दे, नाम निरालम्ब सार ।।२।।
 योग युक्ति जगदीश दे, सूक्ष्म ध्यान दयाल । अकलि अकीन अजन्म जति, अष्ट सिद्धि नौ निधि ख्याल ।।३।।
 स्वर्ग नरक बांचै नहीं, मोक्ष बंधन से दूर । बड़ी गरीबी जगत में, संत चरण रज धूर ।।४।।
 जीवत मुक्ता सो कहौ, आशा तृष्णा खण्ड । मन के जीते जीत है, क्यों भरमैं ब्रह्मण्ड ।।५।।
 शाला कर्म शरीर में, सतगुरू दिया लखाय । गरीबदास गलतान पद, नहीं आवैं नहीं जाय ।।६।।
 चौरासी की चाल क्या, मो सेती सुनि लेह । चोरी जारी करत हैं, जाके मौंहडे खेह ।।७।।
 काम क्रोध मद लोभ लट, छुटी रहै विकराल । क्रोध कसाई उर बसै, कुशब्द छुरा घर घाल ।।८।।
 हर्ष शोक हैं श्वान गति, संसा सर्प शरीर । राग द्वेष बड़ रोग हैं, जम के परे जंजीर ।।९।।
 आशा तृष्णा नदी में, डूबे तीनौं लोक । मनसा माया बिस्तरी, आत्म आत्म दोष ।।१०।।
 एक शत्रु एक मित्र है, भूल पड़ी रे प्राण । जम की नगरी जाहिगा, शब्द हमारा मान ।।११।।
 निंद्या बिंद्या छाडि दे, संतों सूं कर प्रीत । भवसागर तिर जात है, जीवत मुक्ति अतीत ।।१२।।
 जे तेरे उपजै नहीं, तो शब्द साखि सुनि लेह । साक्षीभूत संगीत है, जासे लावो नेह ।।१३।।
 स्वर्ग सात असमान पर, भटकत है मन मुढ़ । खालिक तो खोया नहीं, इसी महल में ढूंढ़ ।।१४।।
 कर्म भर्म भारी लगे, संसा सूल बबूल । डाली पांनौं डोलते, परसत नांही मूल ।।१५।।
 श्वासा ही में सार पद, पद में श्वासा सार । दम देही का खोज कर, आवागवन निवार ।।१६।।
 बिन सतगुरू पावै नहीं, खालिक खोज विचार । चौरासी जग जात है, चीन्हत नांही सार ।।१७।।
 मरद गर्द में मिल गये, रावण से रणधीर । कंस केश चाणूर से, हिरणाकुश बलबीर ।।१८।।
 तेरी क्या बुनियाद है, जीव जन्म धर लेत । गरीबदास हरी नाम बिन, खाली परसी खेत ।।१९।।


असुर निकन्दन रमैणी


 सत्पुरुष समरथ ओंकारा। अदली पुरुष कबीर हमारा।। 1।।
 आदि जुगादि दया के सागर, काल कर्म के मोचन आगर।। 2।।
 दुःख भंजन दरबेस दयाला, असुर निकन्दन कर पैमाला।। 3।।
 आव खाक पावक और पौना, गगन सुन्न दरयाई दौना।। 4।।
 धर्म राय दरबारनी चेरा, सुर असुरों का करै निबेरा। सत् का राज धर्मराय कर हीं, अपना किया सभी दंड भर  हीं।। 6।
 शंकर शेष रु ब्रहा विष्णु, नरद शारद जा उर रसनं।। 7।।
 गौरिज और गणेश गोसांई, कारज सकल सिद्ध हो जाई।। 8।।
 ब्रहा विष्णु अरु शंभू शोषा, तीन देव दयाल हमेशा।। 9।।
 सावित्री और लक्ष्मी गौरा, तिहुं देवा सिर कर है चैरा।। 10।।
 पांच तत आरंभन कीना, तीन गुनन मध्य साखा झीना।। 11।।
 सतपुरुष से ओंकारा, अविगत रुप रचे गैनारा।। 12।।
 कच्छ मच्छ कुरंभ और धौला, सिरजन हार पुरुष है मौला।। 13।।
 लख चैरासी साज बनाया, भगलीगर कूं भगल उपाया।। 14।।
 उपजै बिनसैं आवैं जाहीं, मूल बीज कुं संसा नाहीं।। 15।।
 लील नाभि से ब्रहा आए, आदि ओम के पुत्र कहाए।। 16।।
 शम्भू, मनु ब्रहा की साखा, रिग युज साम अथर्बन भाखा।। 17।।
 पीबरत भया उतानंपाता, जाके ध्रू है आत्म ग्याता।। 18।।
 सनक सनन्दन संत कुमारा, चार पुत्र अनुरागी धारा।। 19।।
 तैंतिस कोटि कला विस्तारी, सहंस अठासी मुनिजन धारी।। 20।।
 कश्यप पुत्र सूरज सुर ज्ञानी, तीन लोक में किरण समानी।। 21।।
 साठ हजार संगी बाल केलं, बीना रागी अजब बलेलं।। 22।।
 तीन कोटि योद्धा संग जाके, सिक बंधी है पूर्ण साके।। 23।।
 हाथ खडग गल पुष्प की माला, कश्यप सुत है रुप विशाला।। 24।।
 कौस्तुभ मणी जड्या बिमान तुम्हारा, सुरनर मुनिजन करत जुहारा।। 25।।
 चांद सूरज चकवे पृथ्वी माहीं, निसबासर चरणौं चित लाहीं।। 26।।
 पीठे सूरज सन्मुख चंदा, काटै त्रिलोकी के फंदा।। 27।।
 तारायण सब स्वर्ग समूलं। पखे रहैं सतगुरु के फूलं।। 28।।
 जय-जय ब्रहा समरथ स्वामी, येती कला परम पद धामी।। 29।।
 जय-जय शंभू शंकर नाथा, कला गणेशं गौरिज माता।। 30।।
 कोटि कटक पैमाल करंता, ऐसा शंभू समरथ कंता।। 31।।
 चंद लिलाट सूर संगीता, जोगी शंकर ध्यान उदीता।। 32।
 नील कंठ सोहे गरुडासन, शंभू जोगी अचल सिंहासन।। 33।।
 गंग तरंग छूटे बहुधारा, अजपा तारी जय जय कारा।। 34।।
 रिद्धि सिद्धि दाता शंभू गुसांई, दालिदर मोच सभै हो जाई।। 35।।
 आसन पदम् लगाये जोगी, निःइच्छा निर्बानी भोगी।। 36।।
 सर्प भुवंग गले रुंड माला, बृषभ चढिए दीन दयाला।। 37।।
 वामे कर त्रिशुल बिराजै, दहने कर सुदर्शन साजै।। 38।।
 सुन अरदास देवन के देवा, शंभू जोगी अलख अभेवा।। 39।।
 तू पैमाल करे पल माहीं, ऐसे समरथ शंभू सांई।। 40।।
 एक लाख योजन ध्वजा फरकै, पचरंग झंडे मोहरे रखै।। 41।।
 काल भद्र कृत देव बुलाउं, शंकर के दल सब ही ध्याउं।। 42।।
 भैरों खेत्रपाल पलीतं, भूत अरु दैत्य चढे संगीतं।। 43।।
 राक्षस भंजन बिरद तुम्हारा, ज्यूं लंका पर पदम अठारा।। 44।।
 कोटयों गंधर्व कमंद चढावैं, शंकर दल गिनती नहीं आवै।। 45।।
 मारै हाक दहाक चिंघारै, अग्नि चक्र बानो तन जारैं।। 46।।
 कंप्या शेष धरनि थररानी, जा दिन लंका घाली घानी।। 47।।
 तुम शंभू ईशन के ईशा, वृषभ चढिए बिसवे बीसा।। 48।।
 इन्द्र कुबेर और बरुण बुलाउं, रापति सेत सिंहासन ल्याउं।। 49।।
 इन्द्र दल बादल दरियाई, छियानवैं कोटि की हुई चढाई।। 50।।
 सुरपति चढे इन्द्र अनुरोगी, अनन्त पद्म गंधर्व बडभागी।। 51।।
 कृष्ण भंडारी चढे कुबेरा, अब दिल्ली मंडल बौहर्यों फेरा।। 52।।
 वरुण विनोद चढे ब्रहा ज्ञानी, कला संपूर्ण बारह बानंी।। 53।।
 धर्मराय आदि जुगादि चेरा, चैदह कोटि कटक दल तेरा।। 54।।
 चित्रगुप्त के कागज मांही, जेता उपज्या सतगुरु सांई।। 55।।
 सातों लोक पाल का रासा, उर में धरिये साधू दासा।। 56।।
 विष्णु नाथ हैं असुर निकन्दन, संतो ंके सब काटैं फंदन।। 57।।
 नरसिंह रुप धरे गुरुराया, हिरनाकुश कूं मारन धाया।। 58।।
 शंख चक्र गदा पद्म विराजैं, भाल तिलक जाके उर साजैं।। 59।।
 वाहन गरुड कृष्ण असवारा, लक्ष्मी ढौरे चंवर अपारा।। 60।
 रावण महिरावण से मारे, सेतु बांध सैना दल तारे।। 61
 जरा सिंध और बालि खपाए, कंस केश चानौर हराए।। 62।।
 काली दह में नागी नाथा, सिसुपाल चक्र सैं काट्या माथा।। 63।।
 काल यवन मथुरा पर धाए, अठारा कोटि कटक चढ आए।। 64।।
 मुचकंद पर पीताबंर डारया, कालयवन जहां वेग सिंहार्या।। 65।।
 परसुराम बावन अवतारा, कोई न जाने भेव तुम्हारा।। 66।।
 संखा सुर मारे निर्वानी, बराह रुप धरे परवानी।। 67।।
 राम अवतार रावण की बेरा, हनुमंत हाका सुनी सुमेरा ।। 68 ।।
 आदि मूल बेदी ओंकारा, असुर निकन्दन कीन सिंधारा।। 69।।
 वशिष्ठ विश्वामित्र आये, दुर्वासा और चुणक बुलाए।। 70।।
 कपिल कलंदर कीन्ह जुहारा, फौज नकीब सभन सिरदारा।। 71।।
 गोरख दत दिगंबर बाला, हनुमत अंगद रुप विशाला।। 72।।
 धूव प्रह्लाद और जनक विदेही, सुखदेव संगी परम सनेही।। 73।।
 पारासुर और व्यास बुलाए, नल-नील मौहरे चढ धाये।। 74।।
 सुग्रीव संग और लक्ष्मण बाला, जोर घटा आए घन काला।। 75।।
 जयदेव पायल जंग बजाये, अजामेल और हरिचन्द आये।। 76।।
 तामरध्वज मोरध्वज राजा, अंबरीष कर पूर्ण काजा।। 77।।
 सूरज वांसी पांचों पांडो, काल मीच सिर देवैं डांडो।। 78।।
 धर्म युधिष्ठिर धरे धियाना, अर्जुन लख संधानी बाना।। 79।।
 सहदेव भीम नकुल और कौंता, द्रोपदी जंग का दीन्हा न्योता।। 80।।
 हाथ खप्पर अरु मस्तक बिंदा, ठारह खूहनि मेलै दुंदा।। 81।।
 देवी शिव शिव करै सिंहारै, खडग बाण चक्रों से मारै ।। 82।।
 चैसठ जोगनि बावन बंीरा, भक्षण बदन करैं तदबीरा ।। 83।।
 असुर कटक धूमर उडजाई, सुरौं रक्षा करैं गोसांई ।। 84।।
 पचरंग झंडे लंब लहरिया, दक्खन के दल उतर उतरिया ।। 85।।
 पचरंग झंडे लंब चलाए, दक्खन के दल उतर धाए ।। 86। ।
मोहरै हनुमंत गोरख बाला, हरि के हेत हरौल हमाला ।। 87।।
 चिंहडोल चुणक दुर्वासा देवा, असुर निकंदन बूडत खेवा ।। 88।।
 बलि अरु शेष पतालौ साखा, सनक सनन्दन सुरगों हाका ।। 89।।
 दहुं दिस बाजू ध्रू प्रहलादा, कोटि कटक दल कटा प्यादा ।। 90।।
 बजर बान की बोउं बाडी, सतगुरु संत जीत है राडी ।। 91।।
 जे कोई माने शब्द हमारा, राज करे काबुल कंधारा ।। 92।।
 अरब खरब मक्के कूं ध्याउं, मदीना बांध हद में ल्याउं ।। 93।।
 ईरा तुरा कहां शिकारी, गढ गजनी लग है असवारी।। 94।।
 दिल्ली मंडल पाप की भूमा, धरती नाल जगाउं सुम्मा ।। 95।।
 हस्ती घोरा कटक सिंघारौं, दृष्टि परै असुरों दल मारौं ।। 96।।
 संख पंचायन नादू टेंर, स्वर्ग पतालों हाक सुमेरं ।। 97।।
 बलकालीन सुर बाचा बंधा, पाण्डों जुग द्वापर की संध्या ।। 98।।
 नारद कुंभक रिषि कुर्बाना, मारकंड रुमी रिषि आना ।। 99।।
 इन्द्र रिषंी बकतालब स्वामी, और संत साधू घणनामी ।। 100।।
 नाथ जलंधर और अजैपाला, गुरु मछंदर गोरख बाला ।। 101।।
 भरथरी गोपी चंदा जोगी, सुलतान अधम हैं सब रस भोगी ।। 102।।
 नर हरिदास पखै बलि भीषम, व्यास बचन परमानी सीखं ।। 103||
 नमा और रैदासा रसीला, कोई न जाने अविगत लीला ।। 104।।
 पीपा धन्ना चढे बाजीदा, सेउ सम्मन और फरीदा।। 105।।
 दादू नानक नाद बजाए, मलूक दास तुलसी चढ आए।। 106।।
 कमाल मल्ल और सूर ज्ञानी, रामानन्द के है फुरमानी।। 107।।
 मीरांबाई और कमाली, भीलनी नाचै दे दे ताली।। 108।।
 नासकेतु नकीब हमारा, उद्यालक मुनि करत जुहारा।। 109।।
 साहिब तख्त कबीर ख्वासा, दिल्ली मंडल लीजै बासा।। 110।।
 सतगुरु दिल्ली मंडल आयसी, सूती धरनी सुम्म जगायसी।। 111।।
 काग भुशंड छत्र के आगे, गंधर्व करत चलत है रागै।। 112।
 ऐता गुप्तार रासा पढैगा, सो चढेगा।। 113।।
 चंपैगा पर भूमि सीम, साखी कृष्ण पांचों पांडो भारती भीम।। 114।।
 द्रोपदी के खप्पर में मेदनी समायसी, चैंसठ जोगनी मंगल गायसी।। 115।।
 बजर बान का ताला राक्षस सिर ठीक सी, दक्खन के दल द्वीप उतर कूं झोक सी।। 116।।

|| अथ संध्या आरती ||


 पहली आरती हरि दरबारे, तेज पुंज जहाँ प्राण उधारें || १ ||
 पाती पंच पौहप कर पूजा, देव निरंजन और न दूजा || २ ||
 खण्ड खण्ड में आरती गाजै, सकल मयी हरि जोत विराजै || ३ ||
 शांति सरोवर मज्जन कीजै, जत की धोती तन पर लीजै || ४ ||
 ग्यान अंगोछा मैल न राखै, धर्म जनेऊ सत् मुख भाखे || ५ ||
 दया भाव तिल मस्तक दीजै, प्रेम भक्ति का अचमन लीजै || ६ ||
 जो नर ऐसी कार कमावै, कंठी माला सहज समावै || ७ ||
 गायत्रि सो जो गिनती खोवै, तर्पण सो जो तमक न होवे || ८ ||
 संध्या सो जो संधि पिछाने, मन पसरे कुं घर में आने || ९ ||
 सो संध्या हमरे मन मानी, कहै कबीर सुनो रे ज्ञानी || १० ||
 २
 ऐसी आरती त्रिभुवन तारे, तेज पुंज जहाँ प्राण उधारे || १ ||
 पाती पंच पौहप कर पूजा, देव निरंजन और न दूजा || २ ||
 अनहद नाद पिण्ड ब्रेह्मंडा , बाजत अह निस सदा अखंडा || ३ ||
 गगन थाल जहाँ उडगन मोती, चंद सुर जहाँ निर्मल जोती || ४ ||
 तन मन धन सब अर्पण कीन्हा, परम पुरुष जिन आत्म चीन्हा || ५ ||
 प्रेम प्रकाश भरा उजियारा, कहै कबीर में दास तुम्हरा || ६ ||
 ३
 संध्या आरती करो विचारी, कल दूत जम रहे झख मारी || १ ||
 लाग्या सुषमन कुंची तारा, अनहद शब्द उठै झनकारा || २ ||
 उनमनी संजम अगम घर जाई , अछे कमल में रहया समाई || ३ ||
 त्रिकुटी संजम कर ले दरसन, देखत निरखत मन होय परसन || ४ ||
 प्रेम मगन होय आरती गावैं, कहै कबीर भौजल बहुर न आवै || ५ ||
 ४
 हरि दर्जी का मर्म न पाया, जिन योह चोला अजब बनाया || १ ||
 पानी की सुई पवन का धागा , नौ दस मास सिवते लागा || २ ||
 पांच तत् की गुदरी बनाई, चंद सूरज दो थिगरी लगाई || ३ ||
 कोटि जतन कर मुकुट बनाया , बिच बिच हिरा लाल लगाया || ४ ||
 आपे सिवे आप बनावे , प्रान पुरुष कुं ले पहरावे || ५ ||
 कहे कबीर सोई जन मेरा , नीर खीर का करे निवेरा || ६ ||
 ५
 राम निरंजन आरती तेरी , अवगति गति |
 कहुक समझ पडे नहीं , क्यों पहुंचे मति मेरी || १ ||
 निराकार निरलेप निरंजन , गुण अतीत तिहुं देवा |
 ग्यान ध्यान से रहे निराला , जानी जाय न सेवा || २ ||
 सनक सनन्दन नारद मुनिजन, शेष पार नहीं पावै |
 शंकर ध्यान धरे निस वासर , अजई ताहि झुलावें || ३ ||
 सब सुमिरै अपने अनुमाना , तो गति लखी न जाई |
 कहैं कबीर कृपा कर जन पर , ज्यो है त्यों समझाई || ४ ||
 ६
 नूर की आरती नूर क छाजै, नूर के ताल पखावज वाजे || १ ||
 नूर के गायन नूर कुं गावै, नूर सुनन्ते बहुर न आवै || २ ||
 नूर की बानी बोले नूर, झिलमिल नूर रहया भरपूर || ३ ||
 नूर कबीरा नूर ही भावै, नूर के कहै परम पद पावै || ४ ||
 ७
 तेज की आरती तेज के आगे, तेज का भोग तेज कूं लागे || १ ||
 तेज पखावज तेज बजावै, तेज ही नाचै तेज ही गावे || २ ||
 तेज का थाल तेज की बाती, तेज का पुष्प तेज की पाती || ३ ||
 तेज के आगे तेज बिराजे, तेज कबीरा आरती साजै || ४ ||
 ८
 आपै आरती आपै साजै, आपै किंगर आपै बाजै || १ ||
 आपै ताल झांझ झनकारा, आप नचै अप देखन हारा || २ ||
 आपै दीपक आपै बाती, आपै पुष्प आप ही पाती || ३ ||
 कहै कबीर ऐसी आरती गाऊं, आपा मधे आप समाऊ || ४ ||
 १ 
 अदली आरती अदल समोई , निरभै पद में मिलना होई || १ ||
 तत् का तिलक ध्यान की धोती , मन की माला अजपा जोती || ३ ||
 नूर के दीप नूर के चौरा , नूर के पुष्प नूर के भौरा || ४ ||
 नूर की झांझ नूर की झालर , नूर के संख नूर टालर || ५ ||
 नूर की सेज नूर की सेवा, नूर के सेवक नूर के देवा || ६ ||
 आदि पुरुष अदली अनुरागी , सुन्न सम्पट में सेवा लागी || ७ ||
 खोजो कमल सुरति की डोरी , अगर दीप में खेलो होरी || ८ ||
 निरभै पद में निरति समानी , दास गरीब दरस दरबानी || ९ ||
 २
 अदली आरती अदल उचारा , सत पुरुष दीजो दीदारा || १ ||
 कैसे कर छुटे चौरासी , जुनी संकट बहुत तिरासी || २ ||
 जुगन जुगन हम कहते आए , भौसागर से जीव छुडाये || ३ ||
 कर विश्वास स्वांस कूं पेखो , या तन मे मन मूर्ति देखो || ४ ||
 स्वसा पारस भेद हमारा , जो खोजै सो उतरे पारा || ५ ||
 स्वसा पारस आदि निसानी , जो खोजै सो होए दरबानी || ६ ||
 हरदम नाम सुहंगम सोई , आवागमन बहुर नहीं होई || ७ ||
 अब तो चडौ नाम के छाजे , गगन मंडल में नौबत बाजे || ८ ||
 अगर अलील शब्द सह्दानी , दास गरीब विहंगम बानी || ९ ||
 ३
 अदली आरती अदल बखाना , कोली बुने विहंगम ताना || १ ||
 ग्यान का राच्छ ध्यान की तुरिया , नाम का धागा निश्चये जुरिया || २ ||
 प्रेम की पान कमल की खाडी , सुरति का सूत बुने निज गाडी || ३ ||
 नूर की नाल फिरै दिन राती , जा कोली कुं काल न खाती || ४ ||
 कुल का खूंटा धरनी गाडा , गहर गझिना ताना गाढा || ५ ||
 निरति की नली बुने जे कोई , सो तो कोली अबचल होई || ६ ||
 रेजा राजिक का बुन दीजै , ऐसे सतगुरु साहिब रीझे || ७ ||
 दास गरीब सोई सत कोली , ताना बुन है अर्स अमोली || ८ ||
 ४
 अदली आरती अदल अजूनी , नाम बिना है काया सूनी || १ ||
 झूठी काया खाल लुहारा , इला पिंगला सुषमन द्वारा || २ ||
 कृतघनी भूले नर लोई , जा घाट निश्चये नाम न होई || ३ ||
 सो नर किट पतंग भवंगा , चौरासी में धरि है अंगा || ४ ||
 उद्भिज खानी भुगतै प्राणी , समझै नहीं शब्द सह्दानी || ५ ||
 हम है शब्द शब्द हम माही , हम से भिन्न और कुछ नहीं || ६ ||
 पाप पुन्न दो बिज बनाया , शब्द भेद किन्हें पाया || ७ ||
 शब्दै सर्व लोक में गाजे , शब्द वजीर शब्द है राजे || ८ ||
 शब्दै स्थावर जंगम जोगी , दास गरीब शब्द रस भोगी || ९ ||
 ५
 अदली आरती अदल जमाना , जम जौरा मेटू तलबाना || १ ||
 धर्मराय पर हमरी धाई , नौबत नाम चढो ले भाई || २ ||
 चित्र गुप्त के कागज किरूं , जुगन जुगन मेटू तकसिरू || ३ ||
 अदली ग्यान अदल इक रासा , सुन कर हंस न पावै त्रासा || ४ ||
 अजराईल जुरावर दाना , धर्मराय का है तलवाना || ५ ||
 मेटू तलब करूं तागिरा , भेटे दास गरीब कबीरा || ६ ||
 ६
 अदली आरती अदल पठाऊ , जुगन जुगन का लेखा ल्याऊ || १ ||
 जा दिन नाथे पिण्ड न प्राना , नहीं पानी पवन जिमी असमाना || २ ||
 कच्छ मच्छ कुरम्भ न काया , चंद सुर नहीं दीप बनाया || ३ ||
 शेष महेश गणेश न ब्रह्मा , नारद शारद न विश्कर्मा || ४ ||
 सिद्ध चौरासी ना तेतिसो , नौ अवतार नहीं चौबीसों || ५ ||
 पांच तत्व नाहीं गुण तीना , नाद बिन्द नाही घट सीना || ६ ||
 चित्र गुप्त नहीं कृतम बाजी , धर्मराय नहीं पंडित काजी || ७ ||
 धुंधुकार अनन्त जुग बीते , जा दिन कागज कहु किन चीते || ८ ||
 जा दिन थे हम तख्त खवासा, तन के पाजी सेवक दासा || ९ ||
 संख जुगन परलौ परवाना , सत पुरुष के संग रहाना || १० ||
 दास गरीब कबीर का चेरा , सत लोक अमरापुर डेरा || ११ ||
 ७
 ऐसी आरती पारख लीजै , तन मन धन सब अर्पण कीजै || १ ||
 जाकै नौ लख कुंज दिवाले भारी, गोवर्धन से अनन्त अपारी || २ ||
 अनन्त कोटि जाकै बाजे बाजे , अनहद नाद अमर पुर साजे || ३ ||
 सुन्न मंडल सत लोक निधाना , अगम दीप देख्या अस्थाना || ४ ||
 अगर दीप मे ध्यान समोई , झिलमिल झिलमिल झिलमिल होई || ५ ||
 ताते खोजो काया काशी , दास गरीब मिले अविनाशी || ६ ||
 ८
 ऐसी आरती अपरम पारा , थाके ब्रह्मा वेद उचारा || १ ||
 अनन्त कोटि जाके शम्भु ध्यानी, ब्रह्मा शंख वेद पढे बानी || २ ||
 इन्द्र अनन्त मेघ रस माला , शब्द अतीत बिरध नहीं बाला || ३ ||
 चंद सुर जा के अनन्त चिराग , शब्द अतीत अजब रंग बागा || ४ |
 सात समुद्र जाके अंजन नेना , शब्द अतीत अजब रंग बैना || ५ ||
 अनन्त कोटि जाके वाजे बाजैं , पूर्ण ब्रह्म अमरपुर छाजै || ६ ||
 तीस कोटि रामा औतारी , सीता संग रहंती नारी || ७ ||
 तीन पद्म जाके भगवाना , सप्त नील कन्हवा संग जाना || ८ ||
 तीस कोटि सीता संग चेरी , सप्त नील राधा दे फेरी || ९ ||
 जाके अर्ध रोम पर सकल पसारा, ऐसा पूरण ब्रह्म हमारा || १० ||
 दास गरीब कहे नर लोई , यौह पद चिन्है बिरला कोई || ११ ||
 गरीब सतबादी सब संत हैं , आप आपने धाम | आजिज की अरदास है , सकल संत प्रणाम || १२ ||
 प्रार्थना
 गुरु ज्ञान अमान अडोल अबोल है, सतगुरों शब्द सेरी पिछानी |
 दास गरीब कबीर सतगुरु मिले , आन अस्थान रोप्या छुडानी || १ ||
 दीन के जी दयाल , भक्ति बिर्द दीजिये | खाने जाद गुलाम अपन कर लीजिये || टेक ||
 खाने जाद गुलाम , तुम्हारा है सही | मेहरबान महबूब , जुगन जुग पत रही || १ ||
 बांदी का जाम गुलाम , गुलाम गुलाम है | खडा रहै दरबार, सु आठों जाम है || २ ||
 सेवक तलबदार , दर तुम्हारे कूक हीं | औगुन अनन्त अपार, पडी मोहि चूक ही || ३ ||
 मै घर का बांदी जादा, अर्ज मेरी मानिये | जन कहता दास गरीब अपन कर जानिये || ४ ||
 गरीब जल थल साक्षी इक है, डूंगर डहर दयाल | दशों दिशा कू दर्शन, ना कही जौरा काल || १ ||
 गरीब जै जै जै करुणामयी, जै जै जै जगदीश | जै जै जै तुं जगतगुरु, पूर्ण बीसवे बीस || २ ||
 राग रूप रघुवीर है, मोहन जाका नाम | मुरली मधुर बजाव ही, श्री गरीब दास बलि जाव || ३ ||
 गरीब बांदी जाम गुलाम की, सुनियों अर्ज अवाज | यौह पाजी संग लीजियो, जब लग तुम्हरा राज || ४ ||
 गरीब परलो कोटि अनन्त है, धरनी अम्बर धौल | मैं दरबारी दर खडा, अचल तुम्हारी पौल || ५ ||
 गरीब समरथ तुं जगदीश है, सतगुरु साहिब सार | मैं शरणागति आइया, तुम हो अधम उधार || ६ ||
 गरीब संतों की फुलमाल है, बरणों बित अनुमान | मैं सबहन का दास हूं, करो बंदगी दान || ७ ||
 गरीब अर्ज अवाज अनाथ की, आजिज की अरदास | आवन जाना मेटिया, दीन्हा निश्चल बास || ८ ||
 गरीब सतगुरु के लक्षण कहूं, चाल बिहंगम बीन | सनकादिक पलडे नहीं, शंकर ब्रह्मा तीन || ९ ||
 गरीब दुजा ओप न आपकी, जेते सुरनर साध | मुनियर सिद्ध सब देख्या, सतगुरु अगम अगाध || १० ||
 गरीब सतगुरु पूर्ण ब्रह्म है, सतगुरु आप अलेख | सतगुरु रमता राम है, या मे मीन न मेख || ११ ||
 पूर्ण ब्रह्म कृपा निधान, सुन केशो कर्तार | गरीबदास मुझ दीन की, रखियो बहुत संभार || १२ ||
 गरीब पंजा दस्त कबीर का, सिर पर राखो हंस | जम किंकर चंपे नहीं, उधार जात है बंस || १३ ||
 अलल पंख अनुराग है, सुन मंडल रहे थीर | दास गरीब उधारिया, सतगुरु मिले कबीर || १४||
 सरणा पुरुष कबीर का, सब संतन की ओट | गरीब दास रक्षा करें, कबहू न लागे चोट || १५ ||
 गरीब सतबादी के चरण की, सिर पर डारू धूर | चौरासी निश्चय मिटै, पहुंचे तख्त हजूर || १६ ||
 शब्द स्वरूपि उतरे, सतगुरु सत कबीर | दास गरीब दयालु है, डिगे बधावै धीर || १७ ||
 कर जोरू बिनती करूं, धरूं चरण पर शीस | सतगुरु दास गरीब है, पूर्ण बीसवे बीस || १८ ||
 नाम लिए सब बढे, रिन्चक नहीं कुसुर | गरीब दास के चरण की, सिर पार डारूँ धूर || १९ ||
 गरीब जिस मंडल साधू नहीं, नदी नहीं गुंजार | तज हंसा वह देसाडा, जम की मोटी मार || २० ||
 गरीब जिन मिलते सुख ऊपजै, मेटे कोटि उपाध | भवन चतुर्दश ढूँढिए, परम स्नेही साध || २१ ||
 बन्दी छोड दयाल जी, तुमलग हमरी दौर | जैसे काग जहाज का, सूझे और न ठौर || २२ ||
 साधु माई बाप है, साधु भाई बंध | साध मिलावै राम से, काटे जम के फंद || २३ ||
 बिना धनि की बंदगी, सुख नही तीनों लोक | चरण कमल के ध्यान से, गरीब दास संतोष || २४ ||
 || शब्द ||
 तारेंगे तहतिक सतगुरु तारेंगे तहतिक || टेक ||
 घट ही मे गंगा, घट ही मे जमुना , घट ही मे है जगदीश || १ ||
 तुम्हरा ही ज्ञाना, तुम्हरा ही ध्याना, तुम्हरे तारन की परतीत || २ ||
 मन कर धीर बाँध ले रे बौरे, छड दे नै पिछल्यों की रीत || ३ ||
 दास गरीब सतगुरु का चेरा, टारेंगे जम की रसीत || ४ ||

||सत साहिब ||